केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने लगातार बारह महीने बिना किसी ऑपरेशनल हताहत के पूरे कर लिए हैं. आखिरी ऑपरेशनल मौत 30 अक्टूबर 2025 को हुई थी. 47 साल बाद यह रिकॉर्ड बना है.इससे पहले ऐसी अवधि जनवरी 1979 में समाप्त हुई थी. यह खबर संख्याओं की नहीं, उन परिवारों की है, जिन्होंने सालों से हर खबर सुनते ही सांस रोककर फोन देखा है.
सीआरपीएफ के जवान अधिकतर उन गांवों और कस्बों से आते हैं, जहां रोजगार के विकल्प कम होते हैं. कई युवा ऐसे परिवारों से निकलते हैं, जहां खेती छोटी है, पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती, या निजी नौकरी का दरवाजा बंद होता है. स्थानीय पुलिस या सेना में जगह न मिले तो सीआरपीएफ जैसी अर्धसैनिक सेवाएं एक रास्ता बन जाती हैं. वेतन नियमित है, लेकिन जीवन की कीमत अक्सर अधिक होती है. जब जवान शहीद होता है तो परिवार को मुआवजा मिलता है, पर वह मुआवजा अक्सर उस गरीबी को स्थायी रूप से नहीं मिटाता, जिससे जवान निकला था. घर में कमाऊ हाथ चला जाता है. बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. मां या पत्नी अकेले रह जाती हैं. कई परिवार सालों तक मुआवजे की फाइलों और वादों के बीच घिसटते रहते हैं. सबसे बड़ी दुखद बात यह है कि सीआरपीएफ के जवान किसी भी ऑपरेशन में अगर अपनी जान गवां देते हैं तो उन्हें कागजी रूप से शहीद नहीं माना जाता है. यह उपाधि केवल सेना के जवानों को नसीब होता है. सीआरपीएफ जैसे बलों के जवानों को मीडिया और आम बोलचाल में भले ही शहीद बोला जाता है पर असल में उनके परिजनों को शहीद कटैगरी की मिलने वाली सुविधाएं नहीं मिलतीं.
यही नहीं ऑपरेशनल कैंप का जीवन और भी कठिन होता है. नक्सल प्रभावित जंगलों में, जम्मू-कश्मीर की घाटियों में या पूर्वोत्तर के इलाकों में जवान महीनों कैंप में रहते हैं. जाड़ा हो या गर्मी, बरसात हो या सूखा—तंबू या अस्थायी बैरक ही घर होते हैं. पानी की कमी, खाने की गुणवत्ता, नींद की कमी और लगातार सतर्कता का बोझ अलग से होता है. कई जवान बताते हैं कि शरीर थक जाता है, मन घबरा जाता है, और कभी-कभी सब्र जवाब दे जाता है. जब घायल जवान समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाता तो छोटी चोट भी जान ले लेती है. पिछले वर्षों में यही कारण रहा कि कई मौतें तुरंत नहीं, बल्कि घायल होने के कई दिनों बाद हुईं.
इस बार का रिकॉर्ड इसलिए बना क्योंकि बल ने घायलों को तेजी से चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंचाने पर जोर दिया. आधुनिक उपकरण, बेहतर प्रशिक्षण और रणनीतिक योजना ने भी भूमिका निभाई. बल अब भी नक्सल क्षेत्रों, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में गहन रूप से तैनात है, फिर भी एक साल बिना ऑपरेशनल मौत के बीता. यह बताता है कि जान बचाना संभव है.अगर तैयारी और प्रतिक्रिया दोनों पर ध्यान दिया जाए.
लेकिन यह उपलब्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं. सीआरपीएफ ही नहीं, अन्य सुरक्षा बलों में भी हर साल जवान शहीद होते रहे हैं. उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति शहादत के बाद भी अक्सर वही रहती है. मुआवजा, पेंशन और सरकारी नौकरी के वादे कागज पर अच्छे लगते हैं, पर जमीन पर कई परिवारों को सालों इंतजार करना पड़ता है. जब जवान गरीब परिवार से आता है तो उसकी मौत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, पूरे घर की आर्थिक रीढ़ की टूट होती है.
देश को इन जवानों की जरूरत है. उनकी बहादुरी के बिना आंतरिक सुरक्षा संभव नहीं. लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि उनकी जान बचाने की कोशिश हर बल में निरंतर हो. कैंपों में खाने-पानी और रहने की बेहतर व्यवस्था हो. घायल जवानों को हवाई साधनों से अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए. और सबसे महत्वपूर्ण—शहीद होने पर परिवार को ऐसा सहयोग मिले जो उनकी माली हालत को सचमुच सुधारे, न कि सिर्फ कागजी राहत दे.
एक साल बिना मौत के बीतना सुखद है. लेकिन असली सफलता तब होगी जब यह अपवाद नहीं, नियम बन जाए. जब जवान कैंप से घर लौटे तो परिवार खुश हो, और जब वह शहीद हो तो उसके पीछे छूटे लोग अकेले न रहें. ये जवान देश की शांति के लिए अपनी युवावस्था देते हैं. देश को उनकी जान और उनके परिवारों की गरिमा दोनों की रक्षा करनी चाहिए. यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन हजारों जवानों के प्रति, जो पिछले दशकों में ऑपरेशन में जान गंवा चुके हैं.
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