Homeदेश - विदेशईरान की 7 कड़ी शर्तों पर अटका अमेरिका से शांति समझौता !

ईरान की 7 कड़ी शर्तों पर अटका अमेरिका से शांति समझौता !

तेल प्रतिबंध हटाने से लेकर अमेरिकी सेना की वापसी और जमी हुई अरबों डॉलर की रकम जारी करने तक की मांग; कतर की मध्यस्थता में बातचीत तेज, पश्चिम एशिया के तनाव से कच्चे तेल की कीमतों में उबाल।

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है।दुनिया की नजरें अब ईरान की उन सात प्रमुख शर्तों पर टिकी हैं,जिन्हें लेकर वह अमेरिका के साथ बातचीत और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।कतर की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच बातचीत के प्रयास जारी हैं।वहीं,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और ईरान की प्रतिक्रिया ने इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है।ईरान की मांगों में आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना,क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम करना,तेल निर्यात पर लगी पाबंदियों में राहत देना और विदेशों में जमा ईरानी धनराशि को जारी करना शामिल बताया जा रहा है।इसके अलावा समुद्री रास्तों की सुरक्षा, सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करने और ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी खत्म करने जैसे मुद्दे भी बातचीत के केंद्र में हैं।

ईरान की 7 प्रमुख शर्तें, जिन पर टिकी है शांति वार्ता

1.सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांगईरान चाहता है कि अमेरिका उसके ऊपर लगाए गए आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंधों को हटाए। जुलाई में हुए इस्लामाबाद समझौते के टूटने के बाद लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करना उसकी प्रमुख मांगों में शामिल बताया जा रहा है।

2. क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम होईरान की दूसरी बड़ी शर्त पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों और सैनिकों की मौजूदगी को कम करना है। ईरान इसे अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखता है।

3.तेल निर्यात पर लगी पाबंदियों में राहतईरान चाहता है कि उसके तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं और पहले मिले तेल व्यापार संबंधी छूट को बहाल किया जाए। इससे ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोबारा तेल बेचने का अवसर मिल सकता है।

4. विदेशों में जमा ईरानी धनराशि जारी होईरान की मांग है कि विदेशों में प्रतिबंधों के कारण फंसी उसकी धनराशि जारी की जाए। इसमें कतर के बैंकों में जमा बताई गई रकम भी शामिल है। यह मुद्दा आर्थिक समझौते के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

5. नए समुद्री शिपिंग मार्ग को मान्यताईरान और ओमान के बीच समुद्री आवाजाही तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों के सुरक्षित आवागमन को लेकर नए नियम और व्यवस्था तय करने की मांग भी सामने आई है। ईरान चाहता है कि समुद्री व्यापार के लिए तय व्यवस्था को औपचारिक मान्यता मिले।

6. सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त होईरान की शर्तों में क्षेत्रीय संघर्ष को समाप्त करना भी शामिल है। खासतौर पर लेबनान में इजरायली हमलों को रोकने और पश्चिम एशिया के दूसरे संघर्ष क्षेत्रों में युद्धविराम सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है।

7. ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी समाप्त होईरान चाहता है कि उसके बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म की जाए और उसके आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप बंद हो। यह शर्त होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की बातचीत से भी जुड़ी हुई है।

दो दिन में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव,कतर की मध्यस्थता अहम

कूटनीतिक गतिविधियों के बीच दो दिवसीय होर्मुज खोलने की योजना को लेकर भी चर्चा सामने आई है।इस प्रस्ताव के तहत पहले दिन अमेरिका की कुछ शर्तों पर सहमति बनाने और दूसरे दिन होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बहाल करने की बात कही जा रही है।कतर इस पूरी बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान समेत अन्य क्षेत्रीय देश भी तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिशों में सक्रिय बताए जा रहे हैं।हालांकि, होर्मुज को खोलने की समयसीमा और प्रस्ताव की शर्तों पर अंतिम सहमति की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।

ट्रंप का बयान:ईरान समझौता करना चाहता है,लेकिन भरोसे की कमी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान बातचीत करना चाहता है और वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ सकती है।हालांकि, उन्होंने ईरान के प्रति अविश्वास भी जताया है।अमेरिकी पक्ष की प्रमुख आपत्तियों में परमाणु कार्यक्रम, शसमझौते की शर्तें और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि बातचीत तभी सफल होगी, जब उसकी सुरक्षा और आर्थिक हितों को पर्याप्त महत्व दिया जाएगा।अमेरिकी प्रशासन की ओर से भेजे गए पत्र पर ईरानी प्रतिक्रिया को भी बातचीत की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों पर हमलों और समुद्री आवाजाही में बाधा की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की चिंता बढ़ा दी है।ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की ओर से पहले टैंकरों को लेकर दावे किए गए थे।वहीं,ओमान की नौसेना ने समुद्री संकट के दौरान नाविकों को सुरक्षित निकालने की कार्रवाई की जानकारी दी थी।होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है।यहां लंबे समय तक आवाजाही बाधित रहने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति,पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सीधा असर पड़ सकता है।

यमन,सऊदी अरब और लेबनान तक फैला संकट

पश्चिम एशिया का संकट केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। यमन में हूती गतिविधियों, सऊदी अरब की क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं, इजरायल-लेबनान संघर्ष और गाजा की स्थिति ने पूरे क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है।लेबनान में इजरायली सैन्य कार्रवाई रोकने और गाजा में मानवीय संकट कम करने की मांग भी क्षेत्रीय शांति प्रयासों का अहम हिस्सा बनी हुई है।संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय पक्ष संघर्ष को समाप्त करने की अपील कर रहे हैं।

कच्चे तेल में उबाल, ब्रेंट 113.43 डॉलर प्रति बैरल

पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता का असर कच्चे तेल के बाजार पर भी दिखाई दे रहा है।उपलब्ध आंकड़े के अनुसार, 30 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड का भाव 113.43 डॉलर प्रति बैरल बताया गया।तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर भी पड़ सकता है।यदि समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो कच्चे तेल की खरीद लागत,परिवहन खर्च और आयात बिल बढ़ने की आशंका रहेगी। इसका प्रभाव आगे चलकर पेट्रोल-डीजल, उर्वरक, खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

क्या शांति समझौता संभव है ?

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के सकारात्मक संकेत जरूर मिल रहे हैं,लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।ईरान अपनी आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मांगों पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा,जबकि अमेरिका परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर स्पष्ट गारंटी चाहता है।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन ईरान की सात प्रमुख शर्तों पर बातचीत के लिए तैयार होगा और क्या होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य हो पाएगी?

फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका-ईरान वार्ता,कतर की मध्यस्थता और होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी हैं। इस बातचीत का परिणाम केवल पश्चिम एशिया की राजनीति ही नहीं,बल्कि वैश्विक तेल बाजार और भारत की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।

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