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क्या है Gegeneophis chandgadi, महाराष्ट्र में मिली केंचुए जैसी नई प्रजाति क्यों खास? 


भारत का पश्चिमी घाट नए-नए रहस्य और अनोखी प्रजातियों का घर रहा है. वहीं हाल ही में रिसर्चर ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में जमीन के नीचे रहने वाले बिना पैरों वाली एम्फीबियन की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसे गेगेनिओफिस चांदगडी नाम दिया गया है. जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार इस जीव की खोज कोल्हापुर जिले के चंदगढ़ तालुका के बुजवडे गांव में की गई है. यह रिचर्स इस लिहाज से भी बहुत खास मानी जा रही है कि इस दुर्लभ जीव की खोज किसी जंगल के बजाय एक ग्रामीण के घर के पीछे के एरिया से हुई. वहीं आपको बता दें कि यह यह स्पीशीज अगस्त 2025 में मानसून के दौरान बुजवडे गांव में मिली थी. 

कैसी है यह नई प्रजाति?

गेगेनिओफिस चांदगडी सिसिलियन नामक एम्फीबियन समूह से तलाक रखती है.  बिना पैर, लंबे शरीर और जमीन के अंदर रहने की आदत के कारण पहली नजर में इसे केंचुआ या ब्लाइंड स्नेक समझा जाता है. वहीं इसका पूरा शरीर गहरे मांसल या गहरे भूरे रंग का, सिर हल्का गुलाबी और पेट पारदर्शी गुलाबी होता है, जिससे उसकी अंदरूनी अंग हल्के से देखे जा सकते हैं. इसकी लंबाई 105 से 185 मिली मीटर के बीच होती है और इसकी कोई पूछ नहीं होती है. इसके बेलनाकार शरीर पर 132 से 135 प्राइमरी छल्ले बने हुए होते हैं, जो ग्रांडिसोनिएडे परिवार की विशेषता बताता है. वहीं इस प्रजाति का नाम चंदगढ़ क्षेत्र और उसके आसपास बोली जाने वाली मराठी भाषा की स्थानीय बोली चंदगडी के नाम पर रखा गया है. 

घर के पीछे हुई ऐतिहासिक खोज

इस रिसर्च के अनुसार बुजावाडे गांव स्थित एक घर के पीछे में पड़ी लकड़ी की सड़ती हुई लकड़ियों, जैविक कचरे और बांस के पत्तों के नीचे यह जीव पाया गया है. जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के सीनियर साइंटिस्ट के.पी. दिनेश और निदेशक धृती बनर्जी के अनुसार यह रिसर्च साबित करती है कि विज्ञान के लिए नई प्रजातियां खोजने के लिए हमेशा दूर दराज के जंगलों में जाना जरूरी नहीं है. हमारे आसपास की मिट्टी और पर्यावरण में भी छिपी हुई जैव विविधता का भंडार है. यह जीव कृषि और आवासीय इलाकों में भी जीवित रहने में सक्षम है, हालांकि वहां पर्याप्त जैविक कचरा हो और कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. 

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पर्यावरण के लिए रिसर्च का महत्व 

भारत में पाई जाने वाली एम्फीबियन की 458 प्रजातियों में से 41 सिसिलियन प्रजातियां हैं. इनमें से 12 प्रजातियां गेगेनिओफिस वंश से संबंधित है, जिनमें से केवल 11 केवल पश्चिमी घाट में ही पाई जाती है. नई प्रजाति के जुड़ने से अब उत्तरी पश्चिमी घाट में इस वंश की 7 प्रजातियां दर्ज हो चुकी है. वहीं जेनेटिक एनालिसिस से पता चलता है कि इस क्षेत्र में 4 दूसरे ऐसे वंश मौजूद है, जो विज्ञान के लिए बिल्कुल नए हो सकते हैं, जिससे आगे और रिसर्च की रिसर्च के लिए जरूरी हो सकते हैं. फिलहाल इस प्रजाति की आबादी और फैलाव की पूरी जानकारी न होने के कारण रिसर्चर ने इसे आईयूसीएन की रेड लिस्ट में डेटा डिफिशिएंट कैटेगरी में रखने की सिफारिश की है. 

पश्चिमी घाट का इकोलॉजिकल महत्व 

वैज्ञानिकों की यह रिसर्च पश्चिमी घाट के विशाल पारिस्थितिक तंत्र की ओर भी लोगों का ध्यान खींचती है. दरअसल दुनिया के 36 जैव विविधता हॉटस्पॉट में से भारत में चार मौजूद है, जिनमें से एक पश्चिमी घाट है. यूनेस्को की ओर से इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है. वहीं 1600 किमी में यह पर्वत श्रृंखला छह राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में फैला हुआ है. यह दक्षिणी पश्चिमी मानसून के लिए प्राकृतिक अवरोध बनाकर भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और नदी तंत्र को कंट्रोल करता है. 

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