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चाइनीज सामान दरकिनार, स्वदेशी दीयों की बहार: 4 घंटे में बन रहे 1000 दीये, झांसी से अयोध्या तक सप्लाई! – Chinese goods sidelined indigenous diyas in spotlight 1000 diyas produced in just 4 hours supplied from Jhansi to Ayodhya lclam


दीपावली का पर्व नजदीक आते ही बुंदेलखंड की माटी में आस्था, परंपरा और रोजगार के रंग घुलने लगे हैं. घरों को रोशन करने वाले मिट्टी के दीये अब सिर्फ झांसी और आसपास के बाजारों की शोभा नहीं बढ़ा रहे, बल्कि अयोध्या की पावन धरती को भी बुंदेलखंड की माटी से जगमग करने की तैयारी है. झांसी के कुम्हार परिवार दिन-रात मेहनत कर दीपावली के लिए हजारों की संख्या में मिट्टी के दीये तैयार कर रहे हैं. इस बार झांसी से अयोध्या के लिए लगभग एक लाख मिट्टी के दीये भेजे जाने की तैयारी है. सात पुश्तों से मिट्टी के दीये बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे कारीगरों के लिए यह दीपावली खास है. एक तरफ अयोध्या में रामलला के मंदिर के बाद मिट्टी के दीयों की मांग में इजाफा हुआ है, तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक चाक ने कारीगरों की मेहनत कम करके उत्पादन को कई गुना बढ़ा दिया है. कभी आर्थिक तंगी और कम आमदनी के चलते पुश्तैनी कारोबार छोड़ने की नौबत झेल रहे कुम्हार परिवार अब फिर से अपने पारंपरिक काम को नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ा रहे हैं.

सात पुश्तों से दीये बना रहा परिवार, अयोध्या तक पहुंच रही कारीगरी

दीपक कारीगर बृजलाल प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी के दीये बनाने का काम उनके परिवार में पिछले सात पुश्तों से चला आ रहा है. उनका परिवार पारंपरिक रूप से दीपावली के लिए मिट्टी के दीये और दीपक तैयार करता है. उनके हाथों से तैयार दीये उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के साथ पूरे बुंदेलखंड में सप्लाई किए जाते हैं. इतना ही नहीं, अयोध्या तक भी उनके बनाए दीये पहुंचते हैं.

बृजलाल बताते हैं कि पहले हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक पर दीये बनाना काफी मेहनत भरा काम था. दिनभर मेहनत करने के बाद भी उत्पादन सीमित रहता था. ऐसे में परिवार का खर्च चलाना और इस पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाना मुश्किल होता जा रहा था. कई बार हालात ऐसे बने कि अधिक मेहनत और कम आमदनी के चलते इस काम को छोड़ने तक की नौबत आ गई.

लेकिन श्रम विभाग की योजना के तहत योगी सरकार की ओर से इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने के बाद उनके काम में बड़ा बदलाव आया है. बिजली से चलने वाली मशीन ने कारीगरों की मेहनत कम कर दी है और अब कम समय में पहले की अपेक्षा अधिक दीये तैयार हो रहे हैं. इससे न केवल काम आसान हुआ है, बल्कि परिवार को दीपावली के सीजन में बेहतर रोजगार भी मिल रहा है.

तीन-चार महीने पहले शुरू हो जाती हैं तैयारियां 

मिट्टी के सामान तैयार करने वाले कारीगर प्रेम नारायण प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार में दीपावली की तैयारियां तीन से चार महीने पहले ही शुरू हो जाती हैं. इस दौरान परिवार के सभी सदस्य मिलकर मिट्टी के अलग-अलग उत्पाद तैयार करने में जुट जाते हैं. उनके यहां मिट्टी की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, बुंदेलखंड की विशेष पहचान ग्वालिन, विभिन्न डिजाइन के दीये और दीपावली की सजावट में इस्तेमाल होने वाले अन्य मिट्टी के सामान बनाए जाते हैं.

प्रेम नारायण के मुताबिक, उनके यहां तैयार होने वाले उत्पादों की मांग केवल झांसी या बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है. इनकी सप्लाई लखनऊ और अयोध्या तक की जाती है. अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद मिट्टी के दीयों की मांग में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है. इसके साथ ही चाइनीज सामान के प्रति लोगों का रुझान कम होने और स्वदेशी उत्पादों के प्रति जागरूकता बढ़ने से स्थानीय कारीगरों को फायदा मिल रहा है.

वह बताते हैं कि पहले हाथ से चाक चलाने में काफी शारीरिक मेहनत करनी पड़ती थी. लगातार काम करने के बाद भी उत्पादन कम होता था, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने से काम की रफ्तार बढ़ गई है. अब पहले की तुलना में लगभग दोगुना उत्पादन हो पा रहा है. इससे परिवार की आमदनी में सुधार हुआ है और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर भी बेहतर तरीके से खर्च कर पा रहे हैं.

प्रेम नारायण बताते हैं कि इस बार भी उनका परिवार और अन्य कारीगर मिलकर लाखों की संख्या में दीये तैयार कर रहे हैं, जिन्हें अयोध्या समेत अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है. उनका कहना है कि एक समय आर्थिक परेशानी के चलते पुश्तैनी कारोबार बंद करने की नौबत आ गई थी, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं और मिट्टी के बर्तनों व दीयों का कारोबार फिर से बेहतर स्थिति में पहुंच रहा है.

पहले पूरे दिन में एक हजार दीये, अब दो से चार घंटे में तैयार हो रहे इतने दीये

दीपक कारीगर देवेंद्र प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी के दीये बनाना उनके परिवार का पुश्तैनी काम है. दीपावली से करीब तीन से चार महीने पहले, बरसात खत्म होते ही इसकी तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं. जैसे-जैसे दीपावली नजदीक आती है, वैसे-वैसे दीयों की मांग और बिक्री में तेजी आने लगती है.

देवेंद्र के मुताबिक, उनके यहां तैयार होने वाले दीये झांसी के अलग-अलग इलाकों के अलावा मध्य प्रदेश और अयोध्या तक भेजे जाते हैं. अयोध्या के लिए भी उनके यहां से करीब 50 हजार दीये भेजे जाते हैं. इस बार भी दीये अयोध्या भेजे गए हैं, हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार संख्या कुछ कम रही है.

वह बताते हैं कि पहले पत्थर के पारंपरिक चाक पर दीये तैयार करने में काफी मेहनत लगती थी. पूरे दिन काम करने के बावजूद मुश्किल से एक हजार दीये ही तैयार हो पाते थे. लेकिन योगी सरकार की ओर से इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने के बाद उत्पादन की तस्वीर बदल गई है. अब महज दो से चार घंटे में एक हजार दीये तैयार हो जाते हैं. इससे समय और श्रम दोनों की बचत हो रही है. कारीगरों को अधिक उत्पादन का मौका मिल रहा है और उनका पुश्तैनी कारोबार भी आगे बढ़ रहा है.

चाइनीज सामान से दूरी और स्वदेशी के प्रति बढ़ता रुझान बना सहारा

स्थानीय कुम्हारों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में बाजार में मिट्टी के दीयों और पारंपरिक उत्पादों के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है. खासकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद वहां दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग को नई पहचान मिली है. चाइनीज सजावटी सामान के स्थान पर स्वदेशी और मिट्टी से बने उत्पादों को अपनाने की अपील का भी स्थानीय कारीगरों को लाभ मिल रहा है.

मिट्टी के दीये केवल रोशनी का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह कुम्हार परिवारों की पीढ़ियों पुरानी कला, संस्कृति और आजीविका से भी जुड़े हैं. इलेक्ट्रॉनिक चाक ने इस पारंपरिक कला को आधुनिक तकनीक का सहारा दिया है. इससे युवा पीढ़ी के सामने भी इस काम को जारी रखने की उम्मीद जगी है.

बुंदेली कारीगरों की मेहनत से रोशन होगी रामनगरी

झांसी के कुम्हारों के लिए अयोध्या तक दीयों की सप्लाई करना सिर्फ कारोबार का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी पारंपरिक कला को बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन से जोड़ने का अवसर भी है. मिट्टी को आकार देकर तैयार किए जा रहे ये दीये जब दीपावली पर अयोध्या की धरती को रोशन करेंगे, तब इनके साथ बुंदेलखंड के कारीगरों की मेहनत और सात पीढ़ियों की विरासत भी जगमगाएगी.

कभी हाथ से चाक घुमाकर सीमित संख्या में दीये बनाने वाले कारीगर अब मशीनों की मदद से अधिक उत्पादन कर रहे हैं. सरकार की योजना, स्वदेशी उत्पादों के प्रति बढ़ती जागरूकता और अयोध्या से मिल रही मांग ने उनके पुश्तैनी कारोबार को नई उम्मीद दी है. इस दीपावली झांसी की माटी से बने दीयों की रोशनी रामनगरी तक पहुंचेगी और बुंदेलखंड की पारंपरिक कुम्हार कला को एक नई पहचान मिलेगी. 

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